उज्जैन में गंगा दशहरा का पर्व इस बार आस्था, भक्ति और सनातन परंपराओं के अद्भुत संगम का साक्षी बना। सुबह होते ही शिप्रा नदी के घाटों पर ऐसा नजारा दिखाई दिया, मानो सिंहस्थ कुंभ की यादें फिर से जीवंत हो उठी हों।
श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के नर्सिंग घाट पर सैकड़ों साधु-संतों का आगमन हुआ। भगवा वस्त्रों, ढोल-नगाड़ों और “हर-हर महादेव” के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। श्रद्धालुओं ने फूलों की वर्षा कर संतों का भव्य स्वागत किया।
पेशवाई ने ताजा की सिंहस्थ की यादें
दत्त अखाड़ा स्थल से संत-महात्माओं की भव्य पेशवाई गाजे-बाजे के साथ शिप्रा तट तक निकाली गई। पेशवाई में शामिल नागा साधु पारंपरिक अंदाज में आगे बढ़ते नजर आए। कई संत घोड़ों और रथों पर सवार होकर निकले, जबकि श्रद्धालु इस दिव्य दृश्य को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते दिखाई दिए।
ढोल-नगाड़ों की गूंज और जयकारों के बीच पूरा उज्जैन आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आया। लोगों को ऐसा महसूस हुआ जैसे सिंहस्थ कुंभ का माहौल एक बार फिर लौट आया हो।
शिप्रा में लगाई आस्था की डुबकी
गंगा दशहरा के अवसर पर संत-महात्माओं ने मोक्षदायिनी मां शिप्रा का पूजन कर पवित्र स्नान किया। आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी शामिल हुए और संतों के साथ पूजा-अर्चना कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
जापान से भी पहुंचे भक्त
इस आयोजन में महामंडलेश्वर कैला गिरी जी महाराज (योग माता केको आइकावा) भी उज्जैन पहुंचीं। उनके साथ जापान से आए कई अनुयायियों ने भी गंगा दशहरा पर शिप्रा में आस्था की डुबकी लगाई और “जय महाकाल” के उद्घोष लगाए।
विदेशी श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने आयोजन को अंतरराष्ट्रीय रंग भी दे दिया।
पीएम मोदी की अपील का दिखा असर
रविंद्र पुरी महाराज ने बताया कि देश-दुनिया में चल रहे युद्ध जैसे हालात और ईंधन बचत को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का असर इस पेशवाई में भी देखने को मिला।
उन्होंने कहा कि कई साधु-संत अपनी बड़ी एसी गाड़ियों की जगह रथों और पारंपरिक वाहनों में सवार होकर पेशवाई में शामिल हुए, ताकि ईंधन की बचत का संदेश दिया जा सके।

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