उज्जैन में वैशाख अमावस्या का पर्व श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु रामघाट और त्रिवेणी घाट सहित विभिन्न घाटों पर स्नान के लिए पहुंचे। श्रद्धालु शिप्रा नदी में आस्था की डुबकी लगाने के साथ ही पूजन-अर्चन करते नजर आए। सुबह से शुरू हुआ स्नान और पूजन का सिलसिला देर शाम तक जारी रहा।
वैशाख अमावस्या को देखते हुए प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए होमगार्ड और एसडीईआरएफ के जवान शिप्रा के घाटों पर आवश्यक आपदा उपकरणों के साथ तैनात किए गए।
पंडित दीपक पंड्या ने बताया कि वैशाख अमावस्या का मुख्य आकर्षण पंचक्रोशी यात्रा की पूर्णता है, जो एकादशी से प्रारंभ होकर अमावस्या पर समाप्त होती है। 118 किलोमीटर की इस कठिन नगर परिक्रमा के बाद श्रद्धालु मोक्षदायिनी शिप्रा नदी में पावन स्नान करते हैं। शिप्रा स्नान और तत्पश्चात दान-पुण्य करने से ही इस यात्रा को पूर्ण माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, अमावस्या के दिन शिप्रा तट पर पितृ तर्पण करने से पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जो श्रद्धालु लंबी यात्रा करने में असमर्थ होते हैं, वे ‘छोटी पंचक्रोशी’ या चौरासी महादेव के दर्शन कर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं, जिससे आयु, आरोग्य और धन-धान्य की प्राप्ति होती है।
पितरों के निमित्त हुआ पूजन
वैशाख माह को अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस माह में देवता और तीर्थ जल में निवास करते हैं। इसलिए इस समय शिप्रा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करना और पितरों के नाम से तर्पण करना अत्यंत शुभ होता है। इससे पितरों को तृप्ति मिलती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
इसी मान्यता के चलते श्रद्धालुओं ने पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर पितरों का स्मरण करते हुए जल अर्पित किया। साथ ही कई स्थानों पर खीर-पूड़ी और अन्य भोजन का भोग लगाकर गाय, कुत्तों और कौओं को खिलाने की परंपरा भी निभाई गई।
इन वस्तुओं का हुआ दान
वैशाख अमावस्या पर दान का विशेष महत्व है। मौसम की गर्मी को देखते हुए इस दिन जरूरतमंदों को ठंडी चीजें और राहत देने वाली वस्तुएं देना पुण्यकारी माना गया है। आज श्रद्धालुओ ने पानी का मटका, छाता, पंखा या चप्पल, कपड़े और बिछावन, भोजन और अनाज दान किया।

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