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उज्जैन पहुंचे CM मोहन यादव, संतों के साथ सिंहस्थ पर किया मंथन; बोले- संत समाज को सही दिशा दिखाते हैं

उज्जैन। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शनिवार को उज्जैन पहुंचे। वे सुबह करीब 11:30 बजे शहर पहुंचे। मुख्यमंत्री के दौरे में धार्मिक कार्यक्रम, औद्योगिक यूनिट का उद्घाटन और युवा धर्म संसद के समापन कार्यक्रम में शामिल होना प्रस्तावित है।

दौरे की शुरुआत इंदौर रोड स्थित होटल अंजुश्री में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम से हुई। मुख्यमंत्री यहां पूज्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि महाराज के प्राकट्य उत्सव के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए।

कार्यक्रम में कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत, संत जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज, राम जन्मभूमि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि महाराज, महामंडलेश्वर अखिलेश्वरानंद महाराज, स्वामी ललितानंद गिरि महाराज, महामंडलेश्वर शैलेशानंद महाराज, सांसद बालयोगी उमेशनाथ महाराज, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, प्रभारी मंत्री गौतम टेटवाल, विधायक सतीश मालवीय और सत्यनारायण जटिया सहित बड़ी संख्या में संत-महात्मा और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।

CM बोले- संत समाज को दिशा दिखाने का काम करते हैं

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंच पर मौजूद महामंडलेश्वरों, साधु-संतों और आध्यात्मिक विभूतियों का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि उज्जैन की पावन धरती पर संतों का इस तरह एकत्र होना विशेष अवसर है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि संत अपने-अपने धर्म और आध्यात्मिक साधना में लीन रहते हैं, लेकिन सच्चे संन्यासी अपना जीवन समाज के लिए समर्पित करते हैं। समाज के सामने आने वाली चुनौतियों और बदलावों को लेकर संत चिंतन करते हैं और लोगों को सही मार्ग दिखाने का कार्य करते हैं।

उन्होंने आगामी सिंहस्थ महाकुंभ को लेकर संतों से आशीर्वाद भी मांगा।

स्वामी अवधेशानंद बोले- ‘यह कुंभ हम सबका है’

कार्यक्रम में स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज ने सिंहस्थ को लेकर कहा कि सनातनी हिंदू समाज के साथ मुस्लिम भाई भी इसमें योगदान देने के लिए आगे आएं। उन्होंने कहा, “यह कुंभ हम सबका है।”

उन्होंने संन्यास के आध्यात्मिक स्वरूप पर भी विस्तार से विचार रखे। स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि नारायण संन्यास के आदिस्वरूप हैं। संन्यासी का जीवन त्याग, संयम और सेवा पर आधारित होता है।

उन्होंने कहा कि संन्यास का अर्थ सांसारिक भोग-विलास से दूर होकर परब्रह्म और परमात्मा की साधना करना है।